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रांची : 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति में संशोधन को लेकर मधु कोड़ा ने सीएम को लिखा पत्र

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रांची:
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति में संशोधन को लेकर पत्र लिखा है। बता दें कि बुधवार 14 सितंबर को झारखंड राज्य सरकार मंत्रिमंडल ने राज्य के निवासियों को स्थानीयता परिभाषित करने के प्रस्ताव को  स्वीकृति दी थी। 

कोल्हान प्रमंडल के स्थानीयता के परिधि से बाहर हो जाएगें
 मधु कोड़ा ने अपने पत्र में लिखा कि 1932 खतियान को कार्ट ऑफ वर्ष सीमित करने से कोल्हान प्रमंडल अंतर्गत जिला क्षेत्रों में निवास करने वाले स्थानीय लोग वर्तमान में मंत्रिपरिषद् से स्वीकृत विधेयक 2022 में परिभाषित स्थानीयता के परिधि से बाहर हो जाएगें। कोल्हान प्रमंडलीय अंतर्गत निवास कर रहे अधिकांश निवासी का हाल सर्वे सेटलमेन्ट 1934, 1958. 1964-65 एवं 1970-72 आदि का जमीन पट्टा और खतियान धारक है। ऐसी स्थिति में कोल्हान प्रमंडल के पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम एवं सराईकेला-खरसावां जिले के लाखों रैयत खतियान धारक निवासी को स्थानीयता से मिलने वाले लाभ से वंचित हो जाएगें। खतियान धारक झारखंडी होने के बावजूद भी स्थानीयता के लिए दूसरे जरियों पर निर्भर होना पड़ेगा। यह बहुत ही विडंबना है साथ ही न्याय संगत भी नहीं है।


अधिकार से वंचित नहीं होना पड़े इसके लिए सुझाव भी दिए
उन्होंने आगे लिखा है कि भूमिहीन के मामलों में स्थानीय निवासी पहचान संबंधित ग्रामसभा की कृत्य शक्ति. कर्त्तव्य संबंधित विषय स्पष्ट नहीं है। उन्होंने सीएम से निवेदन करते हुए कहा है कि झारखंड के एक भी आदिवासी मूलवासी को अपने स्थानीयता के अधिकार से वंचित नहीं होना पड़े इसके लिए निम्नलिखित सुझाव है।
झारखंड मंत्रिपरिषद् द्वारा पारित स्थानीय नीति विधेयक प्रस्ताव में खतियान के कट ऑफ वर्ष 1932 को माना गया है। इस प्रस्ताव में खतियान के कार्ट ऑफ वर्ष को विलोपित कर केवल खातियान आधारित स्थानीयता को दर्ज किया जाए।

क्या है नीति
राज्य सरकार द्वारा लाए गए स्थानीय नीति विधेयक प्रस्ताव में ग्राम सभा को संवैधानिक, अधिनियमित नियम रूप से ग्राम सभा की कृत्य शक्ति, कर्तव्यों एवं जिम्मेदारी को सुस्पष्ट परिभाषित किया जाए।
झारखंड राज्य की भौगोलिक सीमा में निवास करता हो एवं स्वयं अथवा उसके पूर्वज कानाम 1932 अथवा उसके पूर्व सर्वे खतियान में दर्ज हो। 2. भूमिहीन के मामले में उसकी पहचान संबंधित ग्राम सभा द्वारा की जाएगी, जो झारखंड में प्रचलित भाषा, रहन-सहन वेश-भूषा संस्कृति एवं परम्परा इत्यादि पर आधारित होगी।